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मेरी माँ

मेरी माँ दुनिया में सबसे ख़ास,उसके संग ही पूरा होता है मेरा हर अहसास।चेहरे से वो जितनी सुंदर दिखती है,दिल से उससे भी ज़्यादा कोमल, उतनी ही सच्ची लगती है।वो स्नेह, त्याग और सच का अद्भुत संगम है,जिसके बिना मेरी हर जीत भी अधूरी और हर खुशी बेरंग है।दुनिया के सामने वो खुद को सख़्त बना लेती है,पर मैं जानती हूँ—अंदर से वो मोम से भी ज़्यादा पिघल जाती है।उसकी आँखों में मेरे लिए अनकही दुआएँ बसती हैं,उसकी बाँहों में सारी थकानें पलभर में सिमट जाती हैं।मैं कभी–कभी खुद को कम समझ लेती हूँ,पर मेरी माँ की नज़र में मैं हमेशा सबसे सुंदर दिखती हूँ।वो मेरे हर कदम पर चुपचाप अपना साया करती है,मेरी छोटी-सी मुस्कान पर अपनी दुनिया वार देती है।जो मुझे हर पल खास महसूस करवाती है,वो मेरी माँ—जो मेरी हर तकलीफ़ खुद पर ले जाती है।मेरी माँ—मेरी ताकत, मेरी रोशनी, मेरी सबसे बड़ी पहचान,उसके बिना अधूरी है मेरी ज़िंदगी, मेरा जहान।संजना ✍️

कोई तो बताओ !

कोई तो बताओ मैं ज़्यादा बोलती हूँ, ऐसा बहुतों को लगता है।किसी की अच्छाई का ज़्यादा गुणगान करती हूँ, ऐसा बहुतों को लगता है।मैं बहुत उलझन में हूँ, कोई तो बताओ।कहते हैं, मैं दूसरों की अच्छाई से तुरंत प्रभावित हो जाती हूँ। ये ग़लत है या सही, कोई तो बताओ।अकसर सब कहते हैं, मुझसे — “तुममें जो अच्छाई है बस उसे देखो।”क्या दूसरों की अच्छाई से भी प्रेरित होना ग़लत है क्या? कोई तो बताओ।मैंने हँस के धन्यवाद किया उसका, पर मैं चिंतित हूँ।दूसरों की भी अच्छाई देखना ग़लत है क्या? कोई तो बताओ?मैंने सुना है, “दूसरों की अच्छाई देखकर तारीफ़ कर दिया करो, नहीं तो ईश्वर तुमसे तुम्हारी अच्छाईयाँ छीन लेता है।”क्या ये सही है? कोई तो बताओ। क्या तारीफ़ करना ग़लत है? कोई तो बताओ।संजना✍️